देहरादून ने फिर सुनी टन-टन!

कुलदीप रावत

एक बार फिर राजधानी के दिल कहे जाने वाले घंटाघर की धक धक शुरू हो गई है हालांकि यह धक धक आपको टन टन की आवाज में सुनाई देगी जी हां राजधानी देहरादून का दिल कहे जाने वाला घंटाघर फिर से नई धड़कन के साथ शुरू हो गया है देहरादून का घंटाघर अपने आप में अनोखा है आपने चार घड़ी वाले घंटाघर ही देखे होंगे लेकिन देहरादून के घंटाघर पर छह घड़ियां है देहरादून के घंटाघर का निर्माण कार्य 1948 में लाला शेर सिंह और उनके भाइयों ने अपने पिता स्वर्गीय लाला बलवीर सिंह की याद में बनवाना शुरू किया था घंटाघर को बनने में लगभग 4 वर्ष का समय लगा 1952 में देहरादून का घंटाघर बनकर पूरी तरह से तैयार हो गया तब तत्कालीन रक्षा मंत्री भारत सरकार लाल बहादुर शास्त्री ने घंटाघर का उद्घाटन किया था उस वक्त घंटाघर के सुई के 6 कांटे स्विट्जरलैंड से मंगाए गए थे वर्ष 2007 में तकनीकी खराबी के घंटाघर की घड़ी खराब हो गई

पुराने जमाने की मशीन और पुरानी तकनीक का उपचार न मिलने पर 2008 में नगर निगम के तत्कालीन मेयर विनोद चमोली ने घंटाघर की सुईंया चलाने पर दूसरे विकल्पों पर कसरत की। विचार हुआ कि इसकी मशीन की मरम्मत कराकर घड़ी चलाई जाए, लेकिन ऐसा संभव नहीं हुआ। फिर नई घड़ियां व मशीन लगाने पर विचार हुआ लेकिन बजट का अभाव होने से नगर निगम को हर बार हाथ पीछे खींच लेने पड़ रहे थे। ओएनजीसी ने पहल की एवं इसके सौंदर्यीकरण के लिए सीएसआर फंड से 80 लाख रुपये देने की बात कही। इसका काम दो साल पहले शुरू कराया जाना था लेकिन इसकी नींव कमजोर मिली। फिर ब्रिडकुल के जरिए पहले इसकी नींव मजबूत की की गई

https://youtu.be/9X8KAgvoH3o

करीब 12 साल बाद शहर के धड़कन कहे जाने वाले घंटाघर की धक धक शनिवार से फिर शुरू हो गई। बंगलुरू कर्नाटक से तकरीबन साढ़े नौ लाख रुपये में मंगाई गई छह डिजिटल घड़ी को शनिवार सुबह स्थापित कर दिया गया। इसके साथ ही इसके घंटे की टन-टन चालू हो गई।


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