विशेष रिपोर्ट: “दीवार फांदू” इंस्पेक्टर पर आईजी की ‘अमर’ कृपा!

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लोकजन टुडे, ब्यूरो

हल्द्वानी/नैनीताल: कुमाऊं परिक्षेत्र में इन दिनों खाकी का एक नया “चमत्कार” चर्चा का विषय बना हुआ है।

यह कहानी किसी जासूसी उपन्यास से कम नहीं है, जिसमें रोमांच है…

एक्शन (दीवार फांदने वाला) है, और अंत में एक दैवीय आशीर्वाद’ है जो सारे नियमों को ताक पर रख देता है।

🏃‍♂️ ओलंपिक स्तर की ‘दीवार’ और विजिलेंस का ‘जाल’

सबसे पहले बात करते हैं इंस्पेक्टर साहब के उस विश्वप्रसिद्ध “एथलेटिक प्रदर्शन” की। चर्चा है कि जब विजिलेंस की टीम ने अपना जाल बिछाया था, तब साहब ने जो फुर्ती दिखाई, उसे देखकर ओलंपिक चयनकर्ता भी दंग रह जाते। कानून अपना काम करता रह गया और हमारे थ्री-स्टार वाले “धावक” साहब दीवार फांदकर ऐसे ओझल हुए कि लगा मानो कोई ‘गायब होने वाला‘ मंत्र पढ़ लिया हो।आमतौर पर पुलिस अपराधियों का पीछा करती है, लेकिन यहाँ “खाकी” खुद कानून से रेस लगा रही थी। और जीत किसकी हुई? जाहिर है, उस “हुनर” की जिसने साहब को सलाखों के पीछे जाने से बचाकर सीधे ‘स्थानांतरण के रेड कार्पेट’ पर लाकर खड़ा कर दिया।

📜 आईजी साहब का ‘अनुकंपा’ वाला जादुई चश्मा

अब आते हैं उस सरकारी आदेश पर, जिसने नियम-कायदों की धज्जियां उड़ाने में नया कीर्तिमान स्थापित किया है। आईजी कुमाऊं ने जिस “अनुकम्पा” और “निजी व्यय” के आधार पर नैनीताल से ऊधमसिंह नगर की घर-वापसी कराई है, उसने पुलिस महकमे के विद्वानों को भी चक्कर में डाल दिया है।

सवाल ये है कि यह अनुकंपा है किस पर?

न इंस्पेक्टर साहब का परिवार नैनीताल में रहता है।

न उनका कुनबा ऊधमसिंह नगर में बसता है।

न वे उस जिले के मूल निवासी हैं

और तो और, साहब का स्वास्थ्य भी इतना ‘फर्स्ट क्लास’ है कि वह ऊंची दीवारें फांद लेते हैं।

तो फिर यह कौन सी “अनुकंपा” है जो सिर्फ उन्हीं पर बरसती है जिनका नाम विजिलेंस की फाइलों में दर्ज है? क्या अब “दीवार फांदना” किसी गंभीर बीमारी की श्रेणी में आता है जिसके इलाज के लिए ऊधमसिंह नगर की हवा जरूरी है ?

⚖️ नियमों की धज्जियां और रसूख का ‘अमर’ आशीर्वाद

इस तबादले ने साफ कर दिया है कि कुमाऊं में ट्रांसफर के नियम उन “बेचारे” पुलिसकर्मियों के लिए हैं जिनकी कोई पैरवी नहीं, जो चुपचाप पहाड़ों पर ड्यूटी काट रहे हैं। जिनके पास ‘ रसूख‘ और ‘संपर्क विज्ञान’ की डिग्री है, उनके लिए आईजी कार्यालय से सीधा “विशेष कृपा” का शटल चलता है। ?*

जब एक दागी छवि वाले अधिकारी पर इस कदर “आशीर्वाद” बरसता है, तो बाकी फोर्स के मनोबल का क्या होता होगा ?

ईमानदार सिपाही शायद अब ट्रेनिंग में ‘ लॉ ‘ और ‘ इन्वेस्टिगेशन‘ ‘ के बजाय “दीवार फांदना” और “आकाओं को खुश करना” सीखने की सोच रहे होंगे।

कहते हैं *”जाको राखे साइयां, मार सके न कोय“, लेकिन पुलिस विभाग में नया मुहावरा चल रहा है— “जा पर कृपा आईजी की, विजिलेंस बिगाड़े क्या कोय!” दीवार फांदने वाले साहब अब ऊधमसिंह नगर के मैदानों में अपनी नई “अनुकंपा” का आनंद लेंगे, और बाकी विभाग यह सोचकर चाय पिएगा कि अगली बार दीवार फांदने की ट्रेनिंग कहाँ से लेनी है।

आज पूरा पुलिस महकमा डीजीपी, उत्तराखंड की तरफ सवाल भरी निगाहों से देख रहा है कि ऐसे प्रकरणों को कब तक होने देंगे और कब अपने अधिकारों का प्रयोग कर सही निर्णय लेंगे।


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