जन्मदिन स्पेशल: पद्मश्री पुरस्कार लौटाया नहीं स्वीकार ही नहीं किया था उन्होंने…

Share your love



रिपोर्ट: कुलदीप रावत

प्रख्यात पर्यावरणविद् पद्मविभूषण सुंदरलाल बहुगुणा उम्र के 94वें वर्ष में प्रवेश कर चुके हैं। उम्र के आखिरी पड़ाव में पहुंच चुके बहुगुणा शारीरिक रूप से भी काफी कमजोर हो चुके हैं, उनकी नजर भी धुंधली पड़ चुकी है और अब वह काफी कम और धीमी आवाज में बात करते हैं। हालांकि, जैसे ही पर्यावरण का जिक्र आता है, उनकी आंखों में पुरानी चमक लौट आती है और जुबां भी तेज हो जाती है। चिपको जैसे विश्वविख्यात आंदोलन के प्रणेता रहे सुंदरलाल बहुगुणा आज भी अपनी यह बात दोहराने से नहीं भूलते ‘क्या हैं जंगल के उपकार, मिट्टी, पानी और बयार। मिट्टी, पानी और बयार, जिंदा रहने के आधार’।

पर्यावरण संरक्षण के प्रति समर्पित जीवन…

9जनवरी 1927 को टिहरी गढ़वाल के सिल्यारा गांव में जन्में सुंदरलाल बहुगुणा के पर्यावरण संरक्षण के प्रति समर्पित जीवन की यह कहानी सभी को याद होगी, मगर बहुत कम लोग जानते होंगे कि कभी वह देश की आजादी के लिए भी लड़े थे और कांग्रेस के सक्रिय कार्यकर्ता थे। हालांकि आजादी के बाद उन्होंने राजनीतिक जीवन त्यागकर समाज सेवा को अपना अगला लक्ष्य बना लिया। भूदान आंदोलन से लेकर दलित उत्थान, शराब विरोधी आंदोलन में भी उनकी सक्रिय भूमिका रही। इसके अलावा टिहरी बांध के विरोध उनके लंबे संघर्ष के फलस्वरूप केंद्र सरकार ने पुनर्वास नीति में तमाम सुधार किए।

पर्यावरण को बचाने का संदेश…

सुंदरलाल बहुगुणा ने 1981 से 1983 के बीच पर्यावरण को बचाने का संदेश लेकर, चंबा के लंगेरा गांव से हिमालयी क्षेत्र में करीब 5000 किलोमीटर की पदयात्रा की। यह यात्रा 1983 में विश्वस्तर पर सुर्खियों में रही।

सुंदरलाल बहुगुणा का जन्म 9 जनवरी…

 


सुंदरलाल बहुगुणा का जन्म 9 जनवरी 1927 को उत्तराखंड के टिहरी जिले के सिल्यारा गांव में हुआ। प्राथमिक शिक्षा के बाद वह लाहौर चले गए और वहीं से उन्होंने कला स्नातक किया था। पत्नी विमला नौटियाल के सहयोग से उन्‍होंने सिल्‍यारा में ही ‘पर्वतीय नवजीवन मंडल’ की स्थापना भी की। सन 1949 में मीराबेन व ठक्कर बाप्पा के संपर्क में आने के बाद यह दलित वर्ग के विद्यार्थियों के उत्थान के लिए प्रयासरत हो गए तथा उनके लिए टिहरी में ठक्कर बाप्पा होस्टल की स्थापना भी की। दलितों को मंदिर प्रवेश का अधिकार दिलाने के लिए उन्होंने आंदोलन छेड़ दिया। सिलयारा में ही ‘पर्वतीय नवजीवन मंडल’ की स्थापना की। 1971 में सुन्दरलाल बहुगुणा ने 16 दिन तक अनशन किया। चिपको आंदोलन के कारण वह विश्वभर में वृक्षमित्र के नाम से प्रसिद्ध हो गए।

अंतरराष्ट्रीय मान्यता के रूप में 1981 में…

बहुगुणा के कार्यों से प्रभावित होकर अमेरिका की फ्रेंड ऑफ नेचर नामक संस्था ने 1980 में इनको पुरस्कृत किया। इसके अलावा उन्हें कई सारे पुरस्कारों से सम्मानित किया गया । पर्यावरण को स्थाई सम्पति मानने वाला यह महापुरुष ‘पर्यावरण गांधी’ बन गया। अंतरराष्ट्रीय मान्यता के रूप में 1981 में स्टाकहोम का वैकल्पिक नोबेल पुरस्कार मिला।

मैं अपने को इस सम्मान के योग्य नहीं समझता…

सुन्दरलाल बहुगुणा को सन 1981 में पद्मश्री पुरस्कार दिया गया जिसे उन्होंने यह कह कर स्वीकार नहीं किया कि जब तक पेड़ों की कटाई जारी है, मैं अपने को इस सम्मान के योग्य नहीं समझता हूँ।

इन पुरस्कारों के हुए समान्नित…

 

  • 1985 में जमनालाल बजाज पुरस्कार।
  • 1986 में जमनालाल बजाज पुरस्कार (रचनात्मक कार्य के लिए सन)।
  • 1987 में राइट लाइवलीहुड पुरस्कार (चिपको आंदोलन)।
  • 1987 में शेर-ए-कश्मीर पुरस्कार।
  • 1987 में सरस्वती सम्मान।
  • 1989 सामाजिक विज्ञान के डॉक्टर की मानद उपाधि आइआइटी रुड़की द्वारा।
  • 1998 में पहल सम्मान।
  • 1999 में गांधी सेवा सम्मान।
  • 2000 में सांसदों के फोरम द्वारा सत्यपाल मित्तल एवार्ड।
  • सन 2001 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया।

चिपको आंदोलन से सुंदर लाल बहुगुणा ने की थी क्रांति…

26 मार्च, 2018 को चिपको आंदोलन की 45वीं एनिवर्सरी मनाई गई। पेड़ों और पर्यावरण को बचाने से जुड़े ‘चिपको आंदोलन’ की यादें ताजा करने के लिए 26 मार्च का गूगल डूडल 45वीं एनिवर्सरी आफ द चिपको मूवमेंट’ टाइटल से बनाया गया है। चिपको आंदोलन की शुरुआत किसानों ने उत्तराखंड (तत्कालीन यूपी) में पेड़ों की कटाई का विरोध करने के लिए की थी। वह राज्य के वन विभाग के ठेकेदारों के हाथों से कट रहे पेड़ों पर गुस्सा जाहिर कर रहे थे और उनपर अपना दावा ठोंक रहे थे। आंदोलन की शुरुआत 1973 में चमोली जिले से हुई। यह दशकभर के अंदर उत्तराखंड के हर इलाके में पहुंच गया। इस आंदोलन सुंदरलाल बहुगुणा भी कूद पड़े। इस आंदोलन के तहत लोग पेड़ों से चिपक जाते थे, और उन्हें कटने से बचाते थे। सुंदरलाल बहुगुणा को इसी वजह से वृक्षमित्र भी कहा जाता है।

 



Discover more from Lokjan Today

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *