साजिश: चैंपियन करनवाल तो बहाना था निशंक को हराना था!

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लोकसभा चुनाव में विपक्षियों को आरोप प्रत्यारोप करते हुए तो बहुत देखा है लेकिन उत्तराखंड की राजनीति ही बड़ी निराली है यंहा कौन कब आपकी खाई खोद दे ये अंदाजा लगाना बेहद मुश्किल है जिसे खिलाओ वो ही गुर्राता है लेकिन राजनीति में लाभ कमाने के लिए कब कोई दोस्त, दोस्त से दुश्मन हो जाए पता लगाना बड़ा ही जटिल प्रश्न है लेकिन कुछ मोटी बुद्धि के लोगो के दिमाग से कैसे खेला जाता है इसका नज़ारा इस कहानी में देखने को मिलता है ऐसा भी शायद किसी ने अंदाजा नहीं लगाया होगा चलिए आज ऐसे ही साजिश की चर्चा करते है जिसमे चैंपियन करनवाल तो बहाना था निशंक को हराना था का खेल बखूबी खेला गया विश्वस्त सूत्र बताते है कि अगर घर-घर मोदी हर घर मोदी की लहर ना होती तो शायद हरिद्वार सीट हाथ के पाले में जकड़ जाती …

अब जरा गौर कीजिये खानपुर विधायक माननीय चैंपियन साहब को इतना गुस्सा क्यों आ जाता है कि वो अपना आपा ही खो बैठते है और सारी हदें ऐसे पार करते है मानो जुबान पर लगाम ही नहीं है और वही झबरेड़ा विधायक भी किसी से पीछे थोड़े ही थे “तू डाल-डाल मैं पात-पात” आखिर किसके उकसावे में अपना नंबर बढ़ाने की हदे पार कर रहे थे.. ऐसा बताया जा रहा है कि इलाके में ऐसी बदजुबानी कभी न तो किसी ने देखी और नाही किसी ने सुनी..खैर .. अब बात करते है साजिश की “बू” की आखिर क्यों ना सूत्रों की बातो पर यकीन किया जाए, लोकसभा सीट के लिए भाजपा ने अपने उन पुराने सदस्यों पर भरोसा जताया था जिनका बीते ५ वर्ष का कार्यकाल बेहतर रहा और बहुत हद तक हरिद्वार सीट से डॉक्टर निशंक का टिकट फाइनल माना जा रहा था इसी बीच न जाने कहा से सांसद टिकट के नए नए दावेदार सामने आने लगे.. बात यही नहीं ख़त्म होती जब पार्टी विधायक ही बच्चो की तरह लड़ने लगे गौर फरमाइएगा चैंपियन साहब ने अपनी धर्म पत्नी की दावेदारी ही फाइनल बता दी और ना जाने कहा से झबरेड़ा विधायक जी ने भी अपनी धर्म पत्नी का नाम आगे बढ़ाते हुए ये कह दिया कि इनसे काबिल तो कोई है ही नहीं और अब चुनाव में शुरू होता है एक दूसरे को नीचे दिखाने का खेल.. कालिख पोतने का खेल चुनाव शुरू होने से पहले आगाज हुआ और चुनाव समापन पर बड़े ही नाटकीय ढंग से समाप्त भी हो गया कहा एक थप्पड़ में नीचे गिराने की बात हो रही थी तो दूसरी तरफ से नए जमाने में गोली की अहमियत समझाई जा रही थी क्या ये एक प्रायोजित प्रोग्राम था

वही इस खेल के तीसरे किरदार ठाकुर साहब जो प्रदेश के सबसे बड़े दल प्रमुख के यार है उन्होंने तो सीधे सीधे हाथ को सहारा देने की सीधी अपील कर दी थी ये भी साहब फाटकपार गांव में रहते है और लोकसभा सीट पाने के लिए फूल वाली पार्टी से दावेदारी ठोक रहे थे क्या ये भी प्रायोजित थे आखिर किसकी सहमति पर गेम खेला जा रहा था अचानक चुनाव समापन और गेम भी ओवर..आखिर कौन था इसका साजिश कर्ता पुरे मामले पर गौर फरमाए तो न जाने ऐसा क्यों लगता है..चैंपियन करनवाल तो बहाना था निशंक को हराना था… सूत्र तो ये भी बताते है कि इन सब विधान सभाओ से वोट का अनुपात में भी फर्क पड़ा है अब देखने वाली बात ये होगी क्या पुरानी रंजिश के चलते हराने का प्रयास था या फिर अपनी राज गद्दी बचाने का….


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