8 सप्ताह में लोकायुक्त की नियुक्ति करे सरकार- नैनीताल हाई कोर्ट ने दिए निर्देश

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नैनीताल

नैनीताल हाईकोर्ट में आज लोकायुक्त की नियुक्ति व लोकायुक्त संस्थान को सुचारु रूप से संचालित किए जाने के मामले में दायर जनहित याचिका पर सुनवाई की। इस दौरान कोर्ट ने सरकार को प्रदेश में आठ सप्ताह में लोकायुक्त की नियुक्ति के आदेश दिए हैं

 

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत काफी लंबे समय से लोकायुक्त की मांग को लेकर विरोध भी कर रहे थे

सोशल मीडिया में एक पोस्ट में हरीश रावत लिखते हैं

#लोकायुक्त क्यों नहीं बना! ये उत्तराखंड में चर्चा में है और चुनाव में भी यह मुद्दा बनेगा। हमने 2016 में ही लोकायुक्त का चयन कर महामहिम #राज्यपाल के पास स्वीकृति/अनुमोदन (Approval) के लिए पत्रावली भेजी और चयन भी सर्वसम्मत था। माननीय हाईकोर्ट के वरिष्ठतम न्यायधीश की उपस्थिति में चयन हुआ था। लीडर ऑफ अपोजिशन भी उस बैठक में थे और उन्होंने भी सर्वानुमति पर अपने हस्ताक्षर किये थे। क्यों, किसके दबाव में महामहिम राज्यपाल ने हस्ताक्षर नहीं किये! यह एक शोध का विषय है। राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करने के कुकृति के बाद गवर्नर साहब का रवैया बदल गया था, वो केंद्र सरकार के दिशा-निर्देश पर काम कर रहे थे। आज यदि उत्तराखंड लोकायुक्त से वंचित है तो इसका दोष भारतीय जनता पार्टी पर है। 2016 से आज 2022 की तरफ हमारे कदम बढ़ रहे हैं। #उत्तराखंड को एक बार #भाजपा के इस अपराध पर भी गहराई से मंथन करना चाहिए। कथनी और करनी का अंतर साफ होता है।

 

 

बता दें इससे पूर्व हुई सुनवाई में कोर्ट ने सरकार से शपथपत्र के माध्यम से यह बताने के लिए कहा था कि लोकायुक्त की नियुक्ति के लिए अभी तक क्या किया और संस्थान जब से बना है तब से 31 मार्च 2023 तक इस पर कितना खर्च हुआ। कोर्ट ने इसका वर्षवार विवरण पेश करने के लिए कहा था।

ये है मामला

हल्द्वानी गौलापार निवासी रवि शंकर जोशी ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर कर कहा था कि राज्य सरकार ने अभी तक लोकायुक्त की नियुक्ति नहीं की, जबकि संस्थान के नाम पर वार्षिक 2 से 3 करोड़ रुपये खर्च हो रहे हैं। जनहित याचिका में कहा गया कि कर्नाटक और मध्य प्रदेश में लोकायुक्त द्वारा भ्रष्टाचार के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई की जा रही है लेकिन उत्तराखंड में तमाम घोटाले हो रहे हैं।

छोटे से छोटा मामला हाईकोर्ट में लाना पड़ रहा है। जनहित याचिका में यह भी कहा गया कि वर्तमान में राज्य की सभी जांच एजेंसी सरकार के अधीन हैं, जिसका पूरा नियंत्रण राज्य के राजनैतिक नेतृत्व के हाथों में है। वर्तमान में उत्तराखंड राज्य में कोई भी ऐसी जांच एजेंसी नहीं है जिसके पास यह अधिकार हो कि वह बिना शासन की पूर्वानुमति के किसी भी राजपत्रित अधिकारी के विरुद्ध भ्रष्टाचार का मुकदमा पंजीकृत कर सके। विजिलेंस विभाग भी राज्य पुलिस का ही हिस्सा है, जिसका सम्पूर्ण नियंत्रण पुलिस मुख्यालय, सतर्कता विभाग या मुख्यमंत्री कार्यालय के पास रहता है।

एक पूरी तरह से पारदर्शी, स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच व्यवस्था राज्य के नागरिकों के लिए कितनी महत्वपूर्ण है, इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यही है कि पूर्व के विधानसभा चुनावों में राजनैतिक दलों द्वारा राज्य में अपनी सरकार बनने पर प्रशासनिक और राजनैतिक भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए एक सशक्त लोकायुक्त की नियुक्ति का वादा किया था जिसे आज तक पूरा नहीं किया गया है।


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