अद्भुत मिसाल: सबूत भी अभियुक्त भी और जेल भी लेकिन पास जारी करने वालों की अभी होगी जांच?

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बद्रीनाथ-केदारनाथ यात्रा के लिए दिए गए पास पर उत्तर प्रदेश के बाहुबली विधायक चले गए जेल और हो भी गई बेल… लेकिन सवाल जस का तस अभी भी खड़ा है कि आखिर पास बनाने में किस की अहम भूमिका थी… वैसे  तो मुख्य सचिव उत्पल कुमार ने इस बात को मीडिया के सामने कहा है कि उक्त पूरे प्रकरण में सब की जांच होगी… चकित करने वाली बात यह भी है कि जिसने यह पास जारी किया और किसके कहने पर जारी किया उनसे पूछने वाला कोई नहीं है ऐसा लगता है जांच तो उन लोगों की होगी जहां से वह गाड़ियां निकली है और जिन्होंने उक्त पास को माननीय का आदेश मानते हुए गाड़ियां को निकलने दिया..

जिलाधिकारी ऑफिस से दिया गया पास परमिशन

एक बार फिर इतना बड़ा मामला किसके इशारे पर सेट कर दिया?  कौन है वह सेटिंग बाज जिस से घबराते हैं आला अफसरान.. वहीं अगर दूसरी तरफ देखा जाए तो अगर यह गलती कोई थाना प्रभारी या समकक्ष अधिकारी करता तो शायद अब तक उसकी तो शामत आ जाती मुकदमों पर मुकदमा और तारीखों पर तारीख झेलते हुए ना जाने क्या हो जाता है….  जनाब नौकरी करने लायक ना छोड़ा जाता.. ऐसा सोचकर कई छोटे अफसरों की तो सिट्टी बिट्टी गुल है…. और मुरादें भी मांगी जा रही.. भगवान का आभार व्यक्त किया जा रहा है… हे ईश्वर ऐसे लोगों से हमें बचाना.. हम तो नौकरी करने आए हैं परिवार का पालन पोषण करने आए है.. यह बवाल कहां से उड़ कर आ गया.. समझ में यह नहीं आ रहा कि जांच किसकी और क्यों… क्या अपर मुख्य सचिव और डीएम देहरादून द्वारा दिए गए पास फर्जी थे? अगर पास फर्जी थे तो वाकई यह बहुत बड़ी खबर है लेकिन अगर दूसरी बात करें कि पास फर्जी नहीं थे तब भी यह बहुत बड़ी खबर है कि आखिर आप कैसे और क्यों किसी विधायक को बिना जांच किए पास देने की गुस्ताखी कर देते है यह तो साहब वही बात हो गई अपनों को डांटे दूसरों को बांटे.. जय हो ऐसे अफसरों की जो किसी की मुट्ठी में नहीं है बल्कि सरकार को अपनी मुट्ठी में रखते है और अपने इशारों पर नचाने की काबलियत रखते है और ऐसा कर भी रहे है…. इस कहानी के बाद है इस बात का तो खुल्लम-खुल्ला ऐलान हो गया कि सरकार का मदारी कौन है.. क्या होगा जांच में?  कैसे पता चलेगा?  कौन होगा इसका जांच अधिकारी?  क्या एक वरिष्ठ आईएस की जांच कोई जूनियर ऑफिसर कैसे कर सकता है इस मामले में जांच जैसी बात तो कुछ सामने आती ही नहीं इसमें दवा भी हैं सबूत भी हैं और अभियुक्त भी है तो देरी किस बात की है आम आदमी पर मुकदमा करना कितना आसान होता है इस केस को देखकर समझ में आ जाता है और सरकार चलाने वाले अफसरों पर मुकदमा करना कितना मुश्किल होता है यह भी समझ में आ जाता है…


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