न खुदा ही मिला, न विसाले-सनम,न इधर के रहे, न उधर के रहे!

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संवाददाता : करन सहगल

व्यंग चाचा बतौला और भतीजा

आज़ पेश है एक और काल्पनिक कहानी इसका किसी और कहानी से कोई दूर दूर तक वास्ता नहीं है लेखक भागदौड़ भरी जिंदगी में अपने दर्शकों/पाठको के लिए व्यंग्यात्मक और काल्पनिक घटनाओं से भरी कहानियाँ पेश करते रहेंगे। इसे सच्ची घटनाओं से बिल्कुल भी ना जोड़ें 😝😝😝😝😝

न खुदा ही मिला, न विसाले-सनम,न इधर के रहे, न उधर के रहे!

“अरे चाचा, आज तो समझिए साक्षात यमराज के दर्शन टल गए! ‘सुतान’ (धुनाई) के प्रचंड महायज्ञ की पूर्णाहूति के लिए पप्पू के लौंडे हाथ में छड़ी और दिल में गदर लिए सीधे दफ़्तर के गर्भगृह में घुस आए थे। वो तो कहिए कि कौने में रखी उस ऐतिहासिक अलमारी की ओट मिल गई, जिसके पीछे सिमटकर हमारे ‘जाली’ महाराज के परम चेले ‘काली बवाली’ ने अपनी देह के साथ-साथ अपने बचे-खुचे आत्मसम्मान को भी बचा लिया। दृश्य ऐसा भयावह था मानो पप्पू के लौंडे आज काली बवाली की खाल खींचकर उसमें भूसा भरने का मुकम्मल इंतज़ाम करके आए हों!”

चाचा ने हुक्के की नली मुँह से निकाली, धुआं हवा में उछाला और भौंहें चढ़ाकर बोले—”भतीजे, यह तू कौन-से महाभारत का शंखनाद कर रहा है? इस खाकी के पहरे वाले शहर में किसकी इतनी मजाल जो सरे-बाज़ार अपनी दबंगई का इश्तहार बांटे? क्या शहर में ‘खाकी’ का इकबाल अब केवल चालान काटने तक ही महदूद रह गया है? अभी परसों ही तो शहर में दंगे का धुआं शांत हुआ था, अब ये पप्पू के लौंडे कौन-से नए अवतार में प्रकट हो गए? और यह काली बवाली कौन है? नाम से ही किसी उचक्के और जेबकतरे की गंध आ रही है। क्या कोई नया सूरमा मैदान में उतरा है जिसे पप्पू के लौंडे ढूँढ रहे हैं?”

“अरे चाचा! आप भी किस दुनिया में रहते हैं!” भतीजे ने अपनी कमीज़ की आस्तीन चढ़ाते हुए कहा, “यह काली बवाली वही महानुभाव हैं जो हमारे उस सुप्रसिद्ध फर्ज़ी जाली के पक्के चेले हैं। काम इनका बस इतना है कि जाली की छांव में रहकर शहर भर की मुखबिरी फरमाएं। माल-पानी देखते ही इनकी नीयत का धर्म-ईमान ऐसे डोलता है जैसे तेज़ हवा में पीपल का पत्ता! इसी चक्कर में हुजूर ने अपने आका यानी ‘मुखिया’ की सेवा में भक्ति का ऐसा अतिरेक दिखाया कि मुखिया जी को ही फजीहत के चौराहे पर खड़ा कर दिया।”

चाचा ने हुक्के की घूंट खींची और आंखें मटकाते हुए बोले, “अरे, तो साफ-साफ बताओ कि माजरा क्या है? जब काली पूरे परगने का घोषित हाकिम बना घूमता है, तो किस माई के लाल की हिम्मत हुई जो इसकी सुतान का मन बना ले?”

“चाचा, आप उस मशहूर पप्पू को तो भली-भांति जानते हैं ना? हुआ यूं कि पप्पू के मुँहबोले चाचा शहर में पधारे थे। पप्पू के लौंडों ने उनके स्वागत में एक आलीशान जलसे का इंतज़ाम किया था। पर हमारे काली बवाली को अपनी हाकिमी का कीड़ा काटा! मुखिया को खुश करने की फितरत में इसने जलसे में आने वाले हर शख्स की ऐसी घेराबंदी की, ऐसी क्लास लगाने की कोशिश की कि डर के मारे जलसे में परिंदा भी न फटके! और जलसा बिना दूल्हे की बारात की तरह फुस्स हो जाए। लेकिन ये हो ना सका।

अब जैसे ही यह ख़बर पप्पू के लौंडों तक पहुंची, उनका पारा सातवें आसमान पर जा चढ़ा। सबने एक स्वर में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किया—’आज काली बवाली की ख़ैर नहीं!'”

भतीजे ने आगे का वृत्तांत चटकारे लेकर सुनाना शुरू किया, “पप्पू गैंग ने अपनी तहकीकात शुरू की और काली को फोन घुमाया। काली बवाली ने अपनी लोकेशन अत्यंत दार्शनिक अंदाज़ में ‘पहाड़ों की वादियों’ में बताई। पर पप्पू के लौंडे भी राजनीति के पक्के खिलाड़ी निकले; उन्हें तुरंत खबर लग गई कि काली वादियों में नहीं, बल्कि अपने दफ़्तर के एसी में बैठकर गलत लोकेशन की फर्जी पतंग उड़ा रहा है। फिर क्या था, पप्पू गैंग ने ललकार मारी—’आज काली की सुतान तय है! आज तेरी जाली उधेड़कर रख देंगे!’सफेद कपड़ों में मलफूज, गुस्से से लाल-पीले पप्पू के लौंडे दफ़्तर की सीढ़ियाँ चढ़ने लगे। जैसे ही सीढ़ियों की ‘धप-धप’ काली के कानों तक पहुंची, उसकी हाकिमी का सारा बुखार पल भर में हिरण हो गया। जान बचाने की आकुलता में वह सबसे पहले अपनी भव्य मेज के नीचे घुसा, पर नियति का क्रूर मज़ाक देखिए—काली का विशालकाय शरीर उस तुच्छ मेज के नीचे समा न सका! जब दिखा कि आज देह का भूगोल बिगड़ने ही वाला है, तो उसने दफ़्तर के कोने में धूल फांक रही एक भारी-भरकम अलमारी के पीछे अपनी काया को ऐसे समेटा मानो कोई बिच्छू अपनी खोल में सिमट रहा हो! पप्पू के लौंडों ने कोना-कोना छाना, गालियां दीं, पर काली अलमारी का भूगोल बने चुपचाप सांस रोके पड़ा रहा। इस पूरे ऐतिहासिक ‘ऑपरेशन सुतान’ का सीधा प्रसारण (लाइव वीडियो) काली के ही एक सताए हुए चेले ‘भुला’ ने अपने मोबाइल में चुपके से दर्ज कर लिया।”

चाचा ने भतीजे को घूरकर देखा और गंभीर स्वर में पूछा—”अबे भतीजे! तू मुझे यह बता कि इस गुप्त महाभारत की पूरी कथा तुझे कैसे पता चली? और तुझे यह कैसे यकीन हुआ कि काली पहले मेज के नीचे घुसा और फिर अलमारी के पीछे छिपकर प्राण-रक्षा की? कहीं तू इस शांत शहर में अफवाह का रायता तो नहीं फैला रहा?”भतीजे ने सीना चौड़ा करते हुए कहा, “अरे चाचा! यह कोई उड़ती हुई अफ़वाह नहीं, साक्षात ‘आंखों देखा हाल’ है! काली से प्रताड़ित उस चेले भुला ने इस वीडियो का पहला प्रीमियर पास वाले चाय वाले की थड़ी पर किया। दोनों ने कुल्हड़ की चाय की चुस्कियों के साथ इस दृश्य का भरपूर आनंद लिया और ठहाके लगाए। फिर शाम को जब मैं वहां चाय की चुस्की लेने पहुँचा, तो भुला ने अत्यंत श्रद्धाभाव से मुझे वह वीडियो दिखाया।

वीडियो दिखाकर उसने मुझसे कहा—’भतीजे, चाचा को यह पूरा किस्सा ज़रूर सुना देना ताकि वे मुखिया जी तक यह खबर पहुंचा दें कि उनके इस ‘खास’ चेले की खाल आज कैसे उधड़ने वाली थी! मुखिया जी को यह भी आगाह कर देना कि यह काली बवाली उनके नाम का सिक्का चलाकर शहर में माल पेल रहा है। मुखिया को खुश करने के नाम पर इसने पप्पू गैंग से जो बेवजह पंगा लिया, वह अब इसी के गले की हड्डी बन गया है।’

आज स्थिति यह है चाचा, कि एक तरफ पप्पू के लौंडे हाथ में लाठी लिए इसे शहर-शहर ढूंढ रहे हैं, और दूसरी तरफ मुखिया जी की फजीहत कराने के गम में काली की दिल की धड़कनें बेकाबू हो चुकी हैं।”चाचा ने हुक्के का लंबा कश लिया, धुएं के छल्ले बनाए और मुस्कुराते हुए तुलसीदास जी के अंदाज़ में मिर्ज़ा ग़ालिब को याद किया—

सच ही कहा है किसी ज्ञानी ने भतीजे…

“न खुदा ही मिला, न विसाले-सनम,
न इधर के रहे, न उधर के रहे!”


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