एक लाख के इनामी शूटर को ‘सेफ कस्टडी’ दिलाने का खेल? योगेश भदौड़ा की गिरफ्तारी में काशीपुर के बड़े नेता समेत कई नामों पर गंभीर आरोप !
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ब्यूरो रिपोर्ट, काशीपुर

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुख्यात गैंग लीडर और एक लाख रुपये के इनामी अपराधी योगेश मलिक उर्फ योगेश भदौड़ा की काशीपुर में हुई गिरफ्तारी अब पुलिस की उपलब्धि से अधिक संदेह और कथित साठगांठ की कहानी बनती दिखाई दे रही है।
आरोप है कि उत्तर प्रदेश पुलिस की कार्रवाई से बचाने के लिए कुख्यात अपराधी को योजनाबद्ध तरीके से उत्तराखंड पुलिस की अभिरक्षा में पहुंचाया गया। इस पूरे घटनाक्रम में काशीपुर के छुटभैया से बने नेता, स्थानीय प्रभावशाली व्यक्तियों, एक अधिवक्ता तथा थाना आईटीआई के अधिकारियों की कथित भूमिका को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
डायल-112 पर सूचना और कुछ ही देर में गिरफ्तारी
पुलिस की ओर से बताया गया कि 8 जुलाई 2026 की सुबह डायल-112 के माध्यम से चैती मेला मार्ग पर एक संदिग्ध व्यक्ति के खड़े होने की सूचना मिली थी। इसके बाद थाना आईटीआई की टीम ने मौके पर पहुंचकर योगेश मलिक उर्फ योगेश भदौड़ा को हिरासत में लिया। उसके पास से कथित रूप से एक देसी तमंचा और तीन जीवित कारतूस बरामद किए गए। उसके विरुद्ध आर्म्स एक्ट में मामला दर्ज किया गया है।
यही पुलिसिया कहानी अब सवालों के घेरे में है। जिस अपराधी को उत्तर प्रदेश पुलिस लंबे समय से तलाश रही थी, वह अचानक काशीपुर में एक सुनसान स्थान पर तमंचे के साथ मिला और डायल-112 की एक कॉल के बाद बिना किसी प्रतिरोध के गिरफ्तार हो गया—क्या यह महज संयोग था या पहले से तय की गई गिरफ्तारी?
साधारण अपराधी नहीं, डी-75 गैंग का लीडर
उपलब्ध आपराधिक इतिहास के अनुसार योगेश भदौड़ा डी-75 गैंग का गैंग लीडर और हिस्ट्रीशीटर संख्या 43-ए है। उसके विरुद्ध मेरठ, बुलंदशहर, बागपत, सहारनपुर तथा गाजियाबाद सहित विभिन्न जनपदों में हत्या, गैंगस्टर एक्ट, हत्या के प्रयास, डकैती, लूट और आयुध अधिनियम से संबंधित कुल 46 मुकदमे दर्ज होने का विवरण उपलब्ध है।
अपराध इतिहास की सूची में हत्या की धारा 302 वाली करीब 19 मुकदमे तथा हत्या के प्रयास की धारा 307 वाले अनेक मुकदमे सम्मिलित हैं। उसके विरुद्ध 40 से अधिक गंभीर मुकदमे और एक लाख रुपये का इनाम घोषित होने की जानकारी दी गई है।
ऐसे में सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि इतने गंभीर आपराधिक इतिहास वाले अपराधी को केवल एक तमंचे की बरामदगी दिखाकर जेल भेजने की पूरी कार्रवाई क्या वास्तव में सामान्य पुलिस कार्रवाई थी?
हमारी खोजी टीम की इनपुट में प्रमुखता से सामने आया छुटभैया से बने नेता का नाम
प्राप्त संवेदनशील इनपुट में दावा किया गया है कि इस कथित व्यवस्था को अंतिम रूप देने और स्थानीय स्तर पर संबंधित लोगों को एक मंच पर लाने में काशीपुर के जाली नेता की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
इनपुट में आरोप है कि जाली छुटभैया ने अपने राजनीतिक और स्थानीय प्रभाव का उपयोग करते हुए प्रधान, ब्लॉक स्तर के नेता एडवोकेट, थाना आईटीआई का कालनेमि तथा अन्य संबंधित व्यक्तियों के बीच समन्वय स्थापित कराया। जांच अगर होती है तो मुखिया के करीबी जाली(फर्जी)नेता की पोल खुलनी तय है l जल्द ही हमारी टीम को सूत्र ने भरोसा दिया है कि उक्त आरोपियों का जल्द एक मजबूत एविडेंस उपलब्ध कराएगा जिसे हम जल्द प्रकाशित भी करेंगे।
हालांकि इन आरोपों की अभी किसी स्वतंत्र जांच एजेंसी अथवा न्यायिक प्रक्रिया से पुष्टि नहीं हुई है। संबंधित व्यक्तियों के कॉल रिकॉर्ड, मुलाकातों, डिजिटल संचार और गिरफ्तारी से पूर्व की गतिविधियों की जांच से ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
अधिवक्ता के माध्यम से प्रायोजित सूचना दिलाने का आरोप
सूत्रों का दावा है कि कथित योजना के अंतर्गत अधिवक्ता के माध्यम से डायल-112 पर सूचना दिलाई गई। आरोप है कि सूचना का समय, गिरफ्तारी का स्थान तथा कथित हथियार की बरामदगी पहले से तय थी।
यदि यह दावा सही पाया जाता है तो इसका अर्थ होगा कि गिरफ्तारी आकस्मिक पुलिस कार्रवाई नहीं, बल्कि अपराधी को सुरक्षित ढंग से पुलिस अभिरक्षा में पहुंचाने के लिए तैयार की गई पटकथा थी।
सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न डायल-112 कॉल की रिकॉर्डिंग, कॉल करने वाले व्यक्ति की लोकेशन और गिरफ्तारी स्थल पर मौजूद मोबाइल नंबरों की जांच से हल हो सकता है।
क्या भारी रकम के बदले तैयार हुआ ‘सेफ कस्टडी’ प्लान?
सूत्रों द्वारा इस मामले में बड़े पैमाने पर कथित आर्थिक लेन-देन की आशंका भी जताई जा रही है। आरोप है कि निजी लाभ और भारी रकम के लालच में कुछ स्थानीय प्रभावशाली लोगों तथा पुलिस अधिकारियों ने योगेश भदौड़ा को उत्तर प्रदेश पुलिस की संभावित कठोर कार्रवाई से बचाने में सहयोग किया।
फिलहाल किसी बैंकिंग दस्तावेज, नकद बरामदगी अथवा अन्य प्रत्यक्ष वित्तीय साक्ष्य के सार्वजनिक रूप से सामने आने की जानकारी नहीं है। इसलिए कथित आर्थिक लेन-देन की पुष्टि संबंधित लोगों के बैंक खातों, हाल के नकद लेन-देन, संपत्ति संबंधी गतिविधियों तथा मध्यस्थ व्यक्तियों की वित्तीय जांच के बाद ही हो सकती है।
ITI पुलिस की भूमिका पर गंभीर प्रश्न
थाना आईटीआई पुलिस की कार्रवाई को लेकर कई बुनियादी प्रश्न उठ रहे हैं:
डायल-112 पर सूचना देने वाला व्यक्ति कौन था?
क्या पुलिस टीम को पहले से अभियुक्त की पहचान और आपराधिक पृष्ठभूमि मालूम थी?
उत्तर प्रदेश पुलिस को गिरफ्तारी से पहले अथवा तुरंत बाद कब सूचना दी गई?
क्या गिरफ्तारी स्थल और समय पहले से निर्धारित था?अभियुक्त के पास मिला तमंचा वास्तव में उसी का था अथवा बरामदगी प्रायोजित थी?
गिरफ्तारी के समय पुलिस टीम के अतिरिक्त कौन-कौन व्यक्ति मौके पर मौजूद था?
थाने की जीडी, सीसीटीवी, वाहन लॉगबुक और मोबाइल लोकेशन पुलिस की कहानी से मेल खाते हैं अथवा नहीं?
इन सवालों के जवाब केवल पुलिस की प्रेस ब्रीफिंग से नहीं, बल्कि डायल-112 की ऑडियो रिकॉर्डिंग, सीसीटीवी फुटेज, कॉल डिटेल रिकॉर्ड, जीडी प्रविष्टियों और हथियार की फॉरेंसिक जांच से सामने आ सकते हैं।
वरिष्ठ अधिकारियों के समक्ष जताई गई नाराजगी का दावा
सूत्रों का यह भी दावा है कि योगेश भदौड़ा को केवल आर्म्स एक्ट में गिरफ्तार दिखाए जाने के बाद उत्तर प्रदेश के कुछ अधिकारियों ने ऊधमसिंह नगर के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों से संपर्क कर नाराजगी व्यक्त की। हालांकि इस कथित वार्ता की स्वतंत्र अथवा आधिकारिक पुष्टि अभी सामने नहीं आई है।यदि ऐसी वार्ता हुई है तो संबंधित अधिकारियों के आधिकारिक संचार और गिरफ्तारी के बाद दोनों राज्यों की पुलिस के बीच हुए पत्राचार का परीक्षण महत्वपूर्ण होगा।
पुलिस की उपलब्धि या सुनियोजित आत्मसमर्पण?
कुख्यात अपराधी की गिरफ्तारी पहली नजर में पुलिस की बड़ी सफलता दिखाई देती है, लेकिन गिरफ्तारी का तरीका और उसके पीछे बताए जा रहे स्थानीय संपर्क इस सफलता पर सवालिया निशान लगा रहे हैं।
क्या योगेश भदौड़ा वास्तव में पुलिस के जाल में फंसा, या उसे योजनाबद्ध तरीके से एक मामूली मामले में गिरफ्तार कराकर सुरक्षित अभिरक्षा दिलाई गई?
क्या राजनीतिक प्रभाव और पुलिस तंत्र के कुछ लोगों ने मिलकर उसे कानूनी राहत दिलाने का रास्ता बनाया? और क्या इस कथित व्यवस्था के पीछे भारी रकम का खेल हुआ?
इन प्रश्नों का उत्तर निष्पक्ष जांच के बिना संभव नहीं है। मामले की गंभीरता को देखते हुए डायल-112 रिकॉर्ड, संबंधित व्यक्तियों के कॉल विवरण, वित्तीय लेन-देन तथा थाना आईटीआई के अभिलेखों की स्वतंत्र जांच कराई जानी आवश्यक है।
सुनने में यह भी तथ्य आया है कि आईटीआई का कौन है कालनेमि जिस पर पूर्व में भी ऐसे आरोप लगाते रहे हैं जब यह कालनेमि हल्द्वानी के पद पर थे तो इनके एक सहयोगी ने हत्या कर इनके यहां पनाह ली थी। जिसमें तत्कालीन एसपी के द्वारा इन्हें निलंबित किया गया था लेकिन अपनी ऊंची पहुंच और जाली(फर्जी) की चरण वंदना के बाद वह सभी आरोपों से मुक्त हो गए।
बने रहिए हमारे साथ जल्द करेंगे खुलासा कुछ रोचक एविडेंस के साथ
इस मामले में नाम सामने आने वाले सभी व्यक्तियों और पुलिस अधिकारियों का पक्ष मांगा गया है। उनकी प्रतिक्रिया प्राप्त होने पर समाचार को अपडेट किया जाएगा।
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