दशहरा और उत्तराखंड: संजीवनी की धरती द्रोणागिरी, जहां हनुमान की पूजा नहीं होती – कितनी सच्चाई?

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लोकजन टुडे, ब्यूरो

देहरादून/चमोली: दशहरा बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व है। उत्तराखंड में यह त्योहार रामलीला, रावण दहन और स्थानीय देवताओं की पूजा के साथ मनाया जाता है। कुमाऊं की संगीतपरक रामलीला और गढ़वाल के रावण दहन के साथ-साथ हिमालय की आध्यात्मिक परंपरा इसे खास बनाती है। लेकिन देवभूमि में एक ऐसी जगह भी है, जो रामायण से जुड़ी होने के बावजूद पूरी तरह अलग कहानी कहती है।

वह स्थान जहां से हनुमान संजीवनी लेकर गएउत्तराखंड के चमोली जिले, जोशीमठ के पास नीति घाटी में स्थित द्रोणागिरी गांव (ऊँचाई लगभग 3,658 मीटर) को स्थानीय मान्यता में वही स्थान माना जाता है, जहां से हनुमान जी लक्ष्मण को बचाने के लिए संजीवनी बूटी लेकर गए थे। रामायण में इसका उल्लेख हिमालय स्थित द्रोणागिरि/गंधमादन पर्वत के रूप में है। गांव के लोग द्रोणागिरी पर्वत (ऊँचाई 7,066 मीटर) को अपना इष्ट देवता मानते हैं।

क्यों नहीं होती हनुमान की पूजा?
स्थानीय लोककथा के अनुसार, हनुमान जी जब संजीवनी खोजने आए तो पर्वत के एक हिस्से को बिना स्थानीय देवता (कुछ कथाओं में लाटू देवता) की अनुमति के उखाड़कर ले गए। ग्रामीण इसे अपने पवित्र पर्वत का “क्षति” मानते हैं। इसलिए सदियों से यहां:

  • हनुमान का कोई मंदिर नहीं है।
  • उनकी मूर्ति या तस्वीर घरों में नहीं रखी जाती।
  • कई परिवार नाम लेना भी टालते हैं।
  • रामलीला में भी हनुमान से जुड़े प्रसंग कम या अलग ढंग से दिखाए जाते हैं।
    यह परंपरा आज भी जीवित है। कई समाचार रिपोर्टों (टाइम्स ऑफ इंडिया, न्यूज18 आदि) और गांव के आधिकारिक विवरण में इसकी पुष्टि होती है। गांव भोटिया समुदाय का है, आबादी छोटी (लगभग 70-100 परिवारों के आसपास) और काफी दूरस्थ है।
    कितनी सच्चाई?
    यह पूरी तरह स्थानीय लोकमान्यता और मौखिक परंपरा पर आधारित है। रामायण में पर्वत का आधुनिक स्थान स्पष्ट नहीं बताया गया है; यह पहचान स्थानीय विश्वास से जुड़ी है। वैज्ञानिक या ऐतिहासिक रूप से “सही स्थान” साबित करना मुश्किल है, लेकिन पूजा न करने की परंपरा वास्तविक और सदियों पुरानी है। यह नफरत नहीं, बल्कि अपने पवित्र स्थान और स्थानीय देवता के प्रति गहरी आस्था का प्रतिबिंब है। गांव वाले राम को मानते हैं, लेकिन हनुमान को अपने पर्वत देवता के समकक्ष नहीं रखते।
  • दशहरा के मौके पर यह कहानी याद दिलाती है कि हिमालय में आस्था सिर्फ एक कहानी नहीं, बल्कि जमीन, पर्वत और समुदाय के रिश्ते से जुड़ी है। अच्छीई की जीत का संदेश जहां पूरे देश में एक जैसा है, वहीं उत्तराखंड की पहाड़ियों में कुछ गांव अपनी अलग सांस्कृतिक स्मृति भी संजोए हुए हैं।

स्थानीय लोककथा के अनुसार, हनुमान जी जब संजीवनी खोजने आए तो पर्वत के एक हिस्से को बिना स्थानीय देवता (कुछ कथाओं में लाटू देवता) की अनुमति के उखाड़कर ले गए। ग्रामीण इसे अपने पवित्र पर्वत का “क्षति” मानते हैं। इसलिए सदियों से यहां:• हनुमान का कोई मंदिर नहीं है।• उनकी मूर्ति या तस्वीर घरों में नहीं रखी जाती।• कई परिवार नाम लेना भी टालते हैं।• रामलीला में भी हनुमान से जुड़े प्रसंग कम या अलग ढंग से दिखाए जाते हैं।यह परंपरा आज भी जीवित है। कई समाचार रिपोर्टों (टाइम्स ऑफ इंडिया, न्यूज18 आदि) और गांव के आधिकारिक विवरण में इसकी पुष्टि होती है। गांव भोटिया समुदाय का है, आबादी छोटी (लगभग 70-100 परिवारों के आसपास) और काफी दूरस्थ है।कितनी सच्चाई?यह पूरी तरह स्थानीय लोकमान्यता और मौखिक परंपरा पर आधारित है। रामायण में पर्वत का आधुनिक स्थान स्पष्ट नहीं बताया गया है; यह पहचान स्थानीय विश्वास से जुड़ी है। वैज्ञानिक या ऐतिहासिक रूप से “सही स्थान” साबित करना मुश्किल है, लेकिन पूजा न करने की परंपरा वास्तविक और सदियों पुरानी है। यह नफरत नहीं, बल्कि अपने पवित्र स्थान और स्थानीय देवता के प्रति गहरी आस्था का प्रतिबिंब है। गांव वाले राम को मानते हैं, लेकिन हनुमान को अपने पर्वत देवता के समकक्ष नहीं रखते।दशहरा के मौके पर यह कहानी याद दिलाती है कि हिमालय में आस्था सिर्फ एक कहानी नहीं, बल्कि जमीन, पर्वत और समुदाय के रिश्ते से जुड़ी है। अच्छीई की जीत का संदेश जहां पूरे देश में एक जैसा है, वहीं उत्तराखंड की पहाड़ियों में कुछ गांव अपनी अलग सांस्कृतिक स्मृति भी संजोए हुए हैं।


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