जानिए गोवर्धन पूजा के बारे में।

देहरादून : गोवर्धन पूजा प्रकृति की पूजा है। गोवर्धन पूजा को ‘अन्नकूट पूजा’ भी कहा जाता है। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण की पूजा का विशेष महत्व होता है। गोवर्धन पूजा के दिन लोग घर के आंगन में गोबर से गोवर्धन पर्वत का चित्र बनाकर और भगवान श्रीकृष्ण की पूजा करते हैं और परिक्रमा लगाते हैं। शास्त्रों के अनुसार, गोवर्धन पूजा के दिन व्रत कथा को पढ़ने से भगवान श्रीकृष्ण प्रसन्न होते हैं और भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करते हैं।

कृष्ण ने माता यशोदा से पूछा लोग इन्द्र की पूजा क्यों करते हैं? उन्हें बताया गया कि वह वर्षा करते हैं जिससे अन्न की पैदावार होती और हमारी गायों को चारा मिलता है। तब श्री कृष्ण ने कहा ऐसा है तो सबको गोवर्धन पर्वत की पूजा करनी चाहिए क्योंकि हमारी गायें तो वहीं चरती हैं। सभी ब्रजवासी इंद्र की जगह गोवर्धन पर्वत की पूजा करने लगे। देवराज इन्द्र ने इसे अपना अपमान समझा और प्रलय के समान मूसलाधार वर्षा शुरू कर दी। तब भगवान कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी उंगली पर उठा कर ब्रजवासियों की भारी बारिश से रक्षा की थी।

भगवान कृष्ण को एक दिन में 8 बार भोग लगाया जाता है और भगवान 7 दिन तक गोवर्धन धारण किए रहे इसलिए माता यशोदा ने उन्हें एकसाथ 56 भोग लगवाए। तब से ही श्री कृष्ण को 56 भोग लगाने का रिवाज चल पड़ा।

तीर्थयात्रा करते हुए पुलस्त्य ऋषि गोवर्धन पर्वत के पास पहुंचे, तो इसकी सुंदरता देखकर वे मंत्रमुग्ध हो गए। तब उन्होंने द्रोणाचल पर्वत से उनके पुत्र गोवर्धन को काशी में स्थापित करने का विचार बताया। गोवर्धन पर्वत ने एक शर्त रखी कि आप मुझे जहां रख देंगे मैं वहीं स्थापित हो जाऊंगा। गोवर्धन दो योजन ऊंचा और पांच योजन चौड़ा था। पुलस्त्य ऋषि ने अपने तपोबल से अपनी हथेली पर उठाकर ले चले। रास्ते में ब्रज आया वहीं रुकने के लिए गोवर्धन पर्वत पुलस्त्य ऋषि के हाथों में और अधिक भारी हो गया। जिससे ऋषि को विश्राम करने की आवश्यकता महसूस हुई। कुछ देर बाद ऋषि पर्वत को वापस उठाने लगे लेकिन गोवर्धन ने कहा कि ऋषिवर अब मैं यहां से कहीं नहीं जा सकता। तब ऋषि ने क्रोधित होकर उसे श्राप दिया कि आज से प्रतिदिन तिल-तिल कर तुम्हारा क्षरण होता जाएगा। कहा जाता है कि कलियुग के अंत तक यह धरती में पूरा समा जाएगा।


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