ट्रंप प्रशासन की पाकिस्तान के प्रति बढ़ती उदारता, भारत और चीन के लिए खतरे की घंटी !

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लोकजन टुडे ब्यूरो, देहरादून

साल 2025 में ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में अमेरिका-पाकिस्तान संबंधों में तेजी से सुधार देखने को मिला है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है सितंबर 2025 में व्हाइट हाउस की वह बैठक, जहां पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और आर्मी चीफ जनरल आसिम मुनीर ने खुद ट्रंप को बालोचिस्तान से दुर्लभ खनिजों (रेयर अर्थ मिनरल्स) के सैंपल दिखाए। ये सैंपल एक लकड़ी के बॉक्स में थे, और ट्रंप काफी दिलचस्पी से उन्हें देख रहे थे। यह बैठक पाकिस्तान के ट्रिलियन डॉलर के खनिज भंडार को हाइलाइट करने का बड़ा प्रयास था।


इस बैठक के कुछ ही महीनों बाद आया सबसे बड़ा ऐलान – अमेरिकी एक्सपोर्ट-इम्पोर्ट बैंक ने रेको डीक कॉपर-गोल्ड माइन के लिए 1.25 अरब डॉलर की फाइनेंसिंग को मंजूरी दी।

रेको डीक दुनिया की सबसे बड़ी अविकसित तांबा-सोने की खदानों में से एक है, जो बालोचिस्तान के चगाई जिले में स्थित है। यह प्रोजेक्ट कनाडाई कंपनी बैरिक गोल्ड चला रही है, और 2028 से उत्पादन शुरू होने की उम्मीद है। इससे अमेरिका को क्रिटिकल मिनरल्स की सप्लाई चेन में चीन पर निर्भरता कम करने में मदद मिलेगी। लेकिन यह निवेश एक अशांत इलाके में है, जहां सुरक्षा चुनौतियां बनी हुई हैं।


रक्षा क्षेत्र में भी अमेरिका ने पाकिस्तान को बड़ा सहारा दिया है। दिसंबर 2025 में 686 मिलियन डॉलर का एफ-16 अपग्रेड पैकेज मंजूर हुआ, जिसमें नए एवियोनिक्स, मिसाइल्स और लॉजिस्टिक सपोर्ट शामिल है।

ये सौदे पाकिस्तान की वायुसेना को मजबूत बनाएंगे और आतंकवाद से लड़ने में मदद करेंगे। ट्रंप प्रशासन का फोकस साफ है – क्रिटिकल मिनरल्स और रणनीतिक साझेदारी।
क्या यह उदारता पाकिस्तान के लिए आर्थिक राहत लेकर आएगी, या क्षेत्रीय तनाव बढ़ाएगी?

ट्रंप प्रशासन की पाकिस्तान नीति से भारत और चीन को संभावित नुकसान
ट्रंप प्रशासन की पाकिस्तान के प्रति बढ़ती उदारता—जैसे रेको डीक खदान में 1.25 अरब डॉलर की एक्सिम बैंक फाइनेंसिंग और एफ-16 अपग्रेड जैसे रक्षा सौदे—दक्षिण एशिया की भू-राजनीति को प्रभावित कर रही है। यह अमेरिका की चीन-विरोधी रणनीति का हिस्सा है, लेकिन भारत और चीन दोनों को इससे रणनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा संबंधी चुनौतियां मिल रही हैं। नीचे विस्तार से समझते हैं, विशेषज्ञ विश्लेषणों के आधार पर।
भारत को संभावित नुकसान
भारत के लिए यह नीति सीधे पाकिस्तान के साथ तनाव बढ़ाने वाली है, क्योंकि यह पाकिस्तान की सैन्य क्षमता मजबूत करती है और अमेरिका-भारत संबंधों में दरार डालती है। मुख्य प्रभाव:

  • सुरक्षा और सीमा तनाव: एफ-16 अपग्रेड (686 मिलियन डॉलर का सौदा) पाकिस्तान की वायुसेना को मजबूत बनाएगा, जो कश्मीर और सीमा पर भारत के लिए खतरा है। मई 2025 के भारत-पाक संघर्ष में चीनी हथियारों (जैसे PL-15 मिसाइल) ने पाकिस्तान को बढ़त दी थी; अब अमेरिकी सौदे इससे और जटिलता जोड़ेंगे। इससे भारत को अपनी रक्षा खरीद (रूस, फ्रांस से) तेज करनी पड़ेगी, जो बजट पर दबाव डालेगा।
  • अमेरिका-भारत संबंधों में तनाव: ट्रंप की पाकिस्तान झुकाव ने भारत पर 50% टैरिफ लगाए हैं, जो निर्यात (फार्मा, कॉपर) को नुकसान पहुंचा रहे हैं। H-1B वीजा पर 1 लाख डॉलर शुल्क से भारतीय आईटी पेशेवर प्रभावित हो रहे हैं (70% वीजा भारतीयों को मिलते हैं)। ट्रंप का दावा कि उन्होंने मई 2025 संघर्ष में मध्यस्थता की, भारत ने खारिज किया, जिससे क्वाड चतुर्भुज सुरक्षा संवाद (क्वाड)जैसे गठबंधनों पर असर पड़ रहा है।
  • चीन के साथ मजबूरी का संबंध: अमेरिका से दूरी के कारण भारत चीन के साथ संबंध सुधारने पर मजबूर हो रहा है (सीमा डी-एस्केलेशन समझौता), लेकिन यह लंबे समय में भारत की स्वायत्तता कम कर सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह भारत को रूस-चीन की ओर धकेल रहा है, जो अमेरिकी हितों के विपरीत है।
    चीन को संभावित नुकसान
    चीन के लिए मुख्य खतरा क्रिटिकल मिनरल्स की सप्लाई चेन और पाकिस्तान पर प्रभाव है, क्योंकि रेको डीक प्रोजेक्ट चीन की एकाधिकार को चुनौती देता है। हालांकि, पाकिस्तान की चीन-निर्भरता इसे सीमित रखती है।
  • क्रिटिकल मिनरल्स पर प्रतिस्पर्धा: रेको डीक (तांबा, सोना, रेयर अर्थ) अमेरिका को चीन पर निर्भरता कम करने का रास्ता देगा। चीन 80% रेयर अर्थ नियंत्रित करता है; यह फाइनेंसिंग (2 अरब डॉलर निर्यात) बालोचिस्तान के 6 ट्रिलियन डॉलर खनिजों तक अमेरिकी पहुंच बढ़ाएगी, जो CPEC (चीन-पाक आर्थिक कॉरिडोर) को कमजोर करेगी। इससे चीन के बैटरी, मिसाइल उद्योग प्रभावित होंगे।
  • पाकिस्तान गठबंधन पर दबाव: अमेरिका-पाकिस्तान नजदीकी CPEC (60 अरब डॉलर) को जोखिम में डाल सकती है, जहां देरी और कर्ज पहले से समस्या हैं। ट्रंप की चीन-विरोधी नीति (रुबियो जैसे हॉक्स) पाकिस्तान को IMF राहत पर दबाव डालेगी, जो चीन के ऋणों से जुड़ी है। मई 2025 संघर्ष में चीनी हथियारों की सफलता से बिक्री बढ़ी, लेकिन अमेरिकी सौदे पाकिस्तान को ‘दोनों तरफ खेलने’ की आजादी देंगे।
  • क्षेत्रीय प्रभाव: क्वाड मजबूत होने से भारत-अमेरिका चीन-विरोधी मोर्चा बढ़ाएंगे, जो ताइवान या दक्षिण चीन सागर में चुनौती बनेगा। हालांकि, पाकिस्तान की वफादारी चीन के साथ बनी रहेगी, लेकिन अमेरिकी निवेश से आर्थिक लाभ कम हो सकता है।

भारत को नुक़सान:
पाकिस्तान की मजबूत वायुसेना से सीमा युद्ध का खतरा; मई 2025 जैसे संघर्ष दोहराव।

50% टैरिफ से निर्यात हानि (फार्मा, आईटी); H-1B प्रतिबंध से 70% प्रभावित।
अमेरिका से दूरी; चीन-रूस की ओर झुकाव मजबूरी।

रक्षा बजट दबाव; QUAD कमजोर।

चीन को नुक़सान:
CPEC पर अमेरिकी हस्तक्षेप से सुरक्षा चुनौतियां; बालोच विद्रोह बढ़ सकता है।

रेयर अर्थ सप्लाई चेन कमजोर; CPEC देरी से 60 अरब डॉलर निवेश जोखिम में।

पाकिस्तान पर पकड़ ढीली; क्वाड मजबूत से इंडो-पैसिफिक में घेराबंदी।

यह नीति अमेरिका के ‘अमेरिका फर्स्ट’ एजेंडे का हिस्सा है, लेकिन विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि यह भारत को अलग-थलग कर सकता है और चीन को नई चुनौतियां देगा। भारत को अपनी QUAD साझेदारी मजबूत करनी होगी, जबकि चीन CPEC को सुरक्षित करने पर फोकस करेगा।


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