धामी जी, हरिद्वार में बड़ा खेला हो गया! करोड़ों के घोटाले को अब निमटाने की बारी, बचाने की ली गई सुपारी!

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संवाददाता: करन सहगल

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नगर निगम हरिद्वार भूमिकांड भूस्वामी, लेखपाल की अहम भूमिका नजरअंदाज
खुद भूस्वामी, सह खातेदार, क्या लाखों का लेन देन भी हुआ?

जिलाधिकारी और नगर आयुक्त निलंबित हो गए। पर जो कांड के केंद्र में है वो जांच के दायरे से बाहर क्यों एक आम नागरिक की “कॉमन सेंस” जो सवाल पूछ रहे हैं l

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नगर निगम हरिद्वार द्वारा की गई भूमि खरीद का मामला आज पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय बना हुआ है। 2-2 IAS यानी जिलाधिकारी और नगर आयुक्त सहित कई लोगों को निलंबित कर दिया गया और धामी सरकार का निर्णय सराहनीय भी था, लेकिन एक आम नागरिक की कॉमन सेंस कुछ ऐसे सवाल पूछ रही है जो अब तक की जांचों में या तो नजरअंदाज किए गए हैं या फिर जानबूझकर टाले जा रहे हैं। सवाल यह है कि इस पूरे कांड का केंद्र बिंदु कौन है? इस पूरे खेल की शुरुआत कहां से शुरू हुई?कौन था इसका सरकारी कर्मचारी खातेदार जिसे सभी ने नजरअंदाज किया। सवाल बेहद बड़ा है इस सरकारी कर्मचारी को जांच के दायरे से बाहर क्यों रखा गया है।

यह तो आम जानकारी है कि हरिद्वार जनपद के लेखपाल कोई सामान्य सरकारी कर्मचारी नहीं है। ये वो विशेष प्राणी हैं जिनके माध्यम से राज्य के बड़े बड़े अधिकारी, नेता और व्यापारी आदि भूमि में निवेश के लिए अपने पैसे लगाते हैं। पिछले एक से दो दशकों में भूमि के दाम आसमान छूने लगे हैं। ऐसे में लेखपालों की भूमि संबंधी स्थानीय जानकारी बहुमूल्य हो गई है। कौन सी जमीन कब, किसकी, किस दाम पर यह जानकारी रखने वाला लेखपाल, स्वाभाविक रूप से आर्थिक निवेश की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है। इस पूरी कहानी में वह सरकारी कर्मचारी हैं, श्री अनुज यादव जो लेखपाल हैं और विवादित भूमि में सह खातेदार भी हैं अनुज यादव इसी तन्त्र के एक प्रभावशाली हिस्से का भाग है।

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लेखपाल अनुज यादव प्रभावशाली तो है ही इसका इस बात से अंदाजा हो जाता है कि जिस मामले में 2 IAS कांड में निपट गए और उसी पूरेकांड में जो जमीन का खातेदार है जिसका नाम अनुज यादव है और वो सरकारी कर्मचारी हैं। हरिद्वार में लेखपाल की पोस्ट पर हैं। वह पूरे मजे में है। यहीं से असली सवाल शुरू होता है। हरिद्वार में यह भी आम चर्चा का विषय रहा है कि अनुज यादव के किसी प्रभावशाली व्यक्ति से करीबी संबंध है। क्या अनुज यादव किसी प्रभावशाली अधिकारी के साथ भूमि निवेशों में हिस्सेदार है? यदि ऐसा है, तो क्या यही समय संरक्षण उन्हें जांच के दायरे से बाहर रख रहा है। जहां एक तरफ धामी सरकार भ्रष्टाचारियों पर नकेल कसने का काम कर रही है, वहीं धामी सरकार के कुछ जयचंद अधिकारी ऐसे लोगों को बचाने का काम कर रहे हैं जिससे कि धामी सरकार की छवि धूमिल हो रही है। ऐसा हम इसलिए कह रहे हैं क्योंकि सामने के सामने इस पूरे मामले में जहां धामी सरकार ने दो बड़े आईएएस अधिकारियों को दोषी मानते हुए तत्काल प्रभाव से हटा दिया, वहीं जिसकी जमीन और सरकारी कर्मचारी लेखपाल को इस पूरी जांच से दूर रखा गया। ऐसा कैसे हो सकता है की जिस जमीन में घोटाला हुआ उस जमीन का सहखातेदार लेखपाल को इस पूरे मामले से आखिर दूर क्यों रखा गया? बड़ा सवाल है। यह सवाल जनता पूछ रही है

क्या लेखपाल अनुज यादव की भूमिका संदिग्ध है? कौन है लेखपाल अनुज यादव हरिद्वार का चर्चित भूमि घोटाला
कांड में केंद्र में आखिर इसका नाम क्यों लिया जा रहा है?

उसी भूमि के स्वामी यानी सहखातेदार जो नगर निगम ने करोड़ों में खरीदी!
लेखपाल, अनुज यादव स्वयं उस खतौनी में सह खातेदार है यानी खुद भी उसी भूमि के स्वामी भी हैं

पन्द्रह वर्षों से भी अधिक समय से हरिद्वार में तैनात हैं।एक अत्यंत अनुभवी लेखपाल

लेखपाल संघ का पदाधिकारी यूनियन में प्रभावशाली पकड़ लाजमी है।

पंद्रह साल की तैनाती में पूरे जिले में अच्छा प्रभाव है जनाब का।

सगे चाचा चाची ताऊ है।भूमि के मुख्य स्वामी और उन्हीं के खातों में गए हैं करोड़ों रुपए।

जिसे भूमि के दस्तावेजों की रखवाली करनी थी, उसी की भूमि सरकारी खजाने से करोड़ों में खरीद ली गई

यह भी सोचने वाली बात है। यदि किसी सरकारी कर्मचारी की पत्नी, भाई या परिजन के खाते में मात्र 50 हजार ₹60 हजार भी संदिग्ध तरीके से आ जाए, तो वह कर्मचारी संदेह के घेरे में आ जाता है। यह नियम है और यह सही भी है पर यहाँ मामला क्या है जो भूमि इस नगर निगम कांड में खरीदी गई, जिसमें 50 करोड़ से अधिक पैसा अदा किया गया, वह एक लेखपाल के निजी पारिवारिक भूमि है। जब संदिग्ध लेनदेन पर भी कर्मचारी जांच के घेरे में आ जाता है। यह विधिक सिद्धांत है। यहां लाखों करोड़ों का मामला है और फिर भी चुप्पी क्यों है?बड़ा सवाल जांच की निष्पक्षता पर सवाल उठाना स्वाभाविक है।

ऐसे पांच सवाल जो जनता जानना चाहती है

सवाल नंबर 1 क्या यह महज संयोग है? खरीदी गई भूमि एक प्रभावशाली लेखपाल की है। नगर निगम जिस जमीन को करोड़ों में खरीदता है वह एक लेखपाल यानी अनुज यादव के सगे चाचा चाची और ताऊ की निकलती है और तो और अनुज यादव स्वयं उस खतौनी में सहखातेदार भी हैं यानी खुद भी उसी भूमिका स्वामी भी है। यह कैसे सरकारी नियम है जिनमें यह संपूर्ण तय जायज माना जा रहा है। क्या यह महज़ एक संयोग है

खरीदने की टाइमिंग और सोचने लायक बात।
नवंबर 2024 में जमीन खरीदी गई और जनवरी 2025 में नगर निकाय चुनाव, जब चुनाव 2-3 महीने बाद ही थे तब ऐसी क्या आफत आन पड़ी थी जो जमीन लेने की वो भी इतनी बड़ी डील? चुनाव से पहले काम खत्म करना जरूरी है वरना नया मेयर बोर्ड आ जाता और है ना मजेदार टाइमिंग

भूमि की स्थिति किसी भी तरह जमीन निकालने का कारण।
इस जमीन की खुद में क्या कीमत है? नगर निगम हरिद्वार जैसे विशाल निगम के कूड़ेघर के बिलकुल बाजू में है तो साहब खुले बाज़ार में तो अच्छे खरीददार तो मिलने से रहे खुले बाज़ार में कीमत भी नहीं मिलती तो फिर नगर निगम ही बचा था, जो चूना लगाने के लिए तो साहब इन भू स्वामियों की मजबूरी तो समझ आती है। पर नगर निगम को यही भूमि क्यों लेनी पड़ी? वो भी करोड़ों में ये सबसे बड़ा सवाल है। यह सवाल अपने आप में बहुत कुछ कह देता है, शायद लेखपाल का प्रभाव और कुछ घूसखोरों का लालच बन गई कांड की रेसिपी।

सवाल नंबर 4
अनुज यादव के खातों की जांच हुई या नहीं अहम सवाल है। यह जिले में आम चर्चा का विषय रहा है कि अनुज यादव और उनके भाई अमित यादव के खातों में भी इस कांड से संबंधित लाखों रुपये आए हैं। क्या यह सच है?क्या इनके खाते जाँच में देखे गए निष्पक्ष जांच में इन सभी खातेदारों की जांच होनी चाहिए और यदि सच में इनके खातों में लाखों रुपए आए हैं तो एक्शन कब होगा?सरकार जब तक इन सवालों को पारदर्शी जवाब नहीं मिलता, सवाल उठाते ही रहेंगे।

जब तक जड़ तक नहीं पहुंचोगे, ऊपर के अधिकारी यूं ही बच निकलेंगे। मीडिया में वाहवाही के लिए जिलाधिकारी और नगर आयुक्त को निलंबित कर दिया गया अच्छा किया पर जब तक इन मुख्य लोगों को नहीं पकड़ोगे तो कल को ये ऊपर के अधिकारी भी बच निकलेंगे।आखिर बिना नीचे की सेटिंग के ऊपर के लोग अकेले यह कांड कैसे कर सकते थे।

सारे भू स्वामियों में अनुज यादव ही वो प्रभावशाली व्यक्ति हैं जिनके पास भूमिका ज्ञान है, अनुभव है। यूनियन की ताकत भी है तथा जिले और राज्य के कुछ प्रभावशाली अधिकारियों से नजदीकियां भी हैं। उनके परिजनों के खातों में इस कांड से करोड़ों रुपये आए। क्या एक प्रभावशाली लेखपाल होने के कारण प्रशासन इन्हें बचाने की कोशिश कर रहा है? यह सवाल जनता पूछ रही है और जवाब भी मांग रही है।

प्राथमिक जांच करने वाले सचिव रणवीर चौहान ने क्या देखा? क्या नहीं देखा? यह भी एक सवाल है जो व्यक्ति उसी भूमि का सहखातेदार है जिसके परिवार में खाते के करोड़ों रुपये आए हैं जिसके अपने खातों में भी शायद लेनदेन हुआ है, वहीं इस पूरे कांड की पूरी धुरी है और वह छूटा हुआ है। सवाल यह भी कि क्या हरिद्वार में रही पुरानी पोस्टिंगों के दौरान बने निजी संबंध जांच की निष्पक्षता के आड़े आ गए हैं।


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