“सिस्टम का सस्पेंस”: दीवार फांदकर भागे इंस्पेक्टर पर ‘खास’ मेहरबानी, अब रवानगी पर लगा ‘मौखिक’ ब्रेक !

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नैनीताल अपडेट: उत्तराखंड पुलिस में अनुशासन का डंडा सिर्फ छोटे कर्मचारियों के लिए है या रसूखदारों के लिए अलग ‘मेनू कार्ड’ तैयार किया गया है? यह सवाल आज कुमाऊं के हर थाने में गूंज रहा है। मामला वही ‘चर्चित’ इंस्पेक्टर अमर चंद शर्मा का है, जिनके ट्रांसफर ऑर्डर ने पहले सुर्खियां बटोरीं और अब उनकी ‘गुपचुप’ रुकने की कहानी महकमे की साख पर बट्टा लगा रही है।

🛑 रिलीविंग पर ‘ब्रेक’ या रसूख का खेल ?

कल तक जो आईजी साहब आदेश पर आदेश निकाल रहे थे कि साहब को “तत्काल प्रभाव” से ऊधमसिंह नगर भेजो, आज उन्हीं के गलियारों से खबर आ रही है कि एसएसपी नैनीताल को ‘इशारों-इशारों’ में कह दिया गया है— “अभी रुकिए, साहब को जाने मत दीजिए।

हैरानी की बात है कि जो आदेश लिखित में आया, उसे रोकने के लिए ‘मौखिक’ सहारा लिया जा रहा है। क्या अब पुलिस महकमा कागजों से नहीं, बल्कि फोन की घंटियों से चलेगा ? यह किस तरह की कार्यप्रणाली है जहाँ एक तरफ विदाई का पत्र लिखा जाता है और दूसरी तरफ पिछले दरवाजे से ‘स्टे’ दे दिया जाता है ?

🤸दीवार फांदने वाली ‘महारत’ और रसूख का ‘कवच

सोशल मीडिया पर लोग पूछ रहे हैं कि क्या विजिलेंस की टीम से बचकर दीवार फांदने वाले इस ‘सुपरफास्ट’ इंस्पेक्टर के पास कोई ऐसी जड़ी-बूटी है जो बड़े-बड़े साहबों को सम्मोहित कर लेती है ?

न घर, न घाट, न बीमारी… फिर भी साहब पर “अनुकम्पा” की बारिश थमने का नाम नहीं ले रही। चर्चा तो यहाँ तक है कि यह ‘होल्ड‘ सिर्फ दिखावा है। जैसे ही शोर थमेगा, साहब ऊधमसिंह नगर के किसी ‘मलाईदार‘ थाने में अपनी नेमप्लेट टांगते नजर आएंगे।

मुख्यालय मौन क्यों ? क्या ‘बॉस’ ने भी मान ली हार?

सबसे बड़ा सवाल *पुलिस मुख्यालय (PHQ)* के लिए है। क्या मुख्यालय के पास इस बात का जवाब है कि एक दागी छवि वाले इंस्पेक्टर के सामने नियम-कायदे इतने बौने क्यों हो गए हैं ? क्या आईजी कुमाऊं के इस ‘मनचाहे‘ फैसले पर देहरादून से कोई लगाम कसेगा या फिर यह मान लिया जाए कि ऊंचे संपर्कों के आगे खाकी का इकबाल खत्म हो चुका है ?

अगला स्टेशन: ऊधमसिंह नगर का ‘मुख्य थाना’?

सूत्र बता रहे हैं कि स्क्रिप्ट पहले ही लिखी जा चुकी है। अभी सिर्फ ‘पब्लिक मेमोरी’ के शांत होने का इंतज़ार है। साहब का रसूख इतना तगड़ा है कि वह खुद तय करते हैं कि उन्हें कब जाना है और कहाँ बैठना है।अब देखना यह है कि *डीजीपी उत्तराखंड* इस मामले में हस्तक्षेप कर महकमे की गरिमा बचाते हैं, या फिर यह ‘अमर गाथा‘ ऐसे ही चलती रहेगी और ईमानदार अफसर सिर्फ तमाशा देखते रहेंगे।

*बने रहिए हमारे साथ, क्योंकि इस ‘दीवार फांदू’ दास्तान में अभी कई और कलाबाजियां बाकी हैं!*


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