रैबार ‘आवा अपणु घौर’ या रह-बाहर!

रैबार ‘आवा अपणु घौर’ या रह-बाहर! 

रैबार ‘आवा अपणु घौर’ या रह-बाहर.. ऐसा हम इसलिए कह रहे हैं क्योंकि पिछले 2 साल से ऐसे बड़े आयोजनों का आयोजन बड़े जोरों शोरों से किया जा रहा है लेकिन सरकार को इसमें कोई सफलता मिलती नहीं दिखी है अंतर एक ही आया है कि मुख्यमंत्री की चारदीवारी में से निकलकर रैबार का आयोजन अब टिहरी झील के किनारे किया गया वैसे तो इस मामले में हरीश रावत ने एक नया खुलासा भी किया है कि टिहरी झील परियोजना के THDC कंपनी को निजी हाथों में देने के लिए सारी तैयारियां पूरी कर ली गई हैं बहरहाल यह तो हरीश रावत के सूत्रों के हवाले की खबर है अगर ऐसा हो जाता है तो निश्चित ही उत्तराखंड वासियों के लिए काफी निराशाजनक खबर है चलिए छोड़िए यह तो रही राजनीति से जुड़ी हुई चर्चा से ज्यादा परेशान करने वाली बात तो यह है कि आखिर उत्तराखंड से विस्थापित हो चुके परिवार वापसी क्यों करें… कुछ ऐसे परेशान करने वाले सवाल हैं जो बाहर स्थापित हो चुके परिवारों को भी सोचने पर भी मजबूर कर रहा है अगर 20 साल की स्थिति को देखा जाए तो उत्तराखंड में अरबों रुपए का बजट खर्च किया जा चुका है सड़कों की हालत यह है कि वह किसी से छुपी नहीं है आए दिन दुर्घटनाओं की खबर से अखबार रंगीन रहते हैं.. शिक्षा की दृष्टि से यह भी किसी से छुपा नहीं है पहाड़ में शिक्षकों का और छात्रों का क्या हाल है यह सब जानते हैं स्कूल है तो मास्टर नहीं है और मास्टर है तो प्रवास इतना ज्यादा बढ़ चुका है उस क्षेत्र का कि वहां पढ़ने वाले ही नहीं बचे है, आंकड़ों पर अगर ध्यान दिया जाए तो बद से बदतर हाल होता जा रहा है शिक्षा और स्वास्थ्य विभाग का… आए दिन शिकायतें मिलती रहती हैं शिक्षकों और डॉक्टरों का अभाव बदस्तूर जारी है आखिर क्या इन्हीं सुविधाओं को लेने के लिए उत्तराखंड में आए? अरबो रूपया खर्च हो चुका है लेकिन आज तक उत्तराखंड में सड़कों का निर्माण तक पूरा नहीं हो पाया है… उत्तराखंड को बने दो दशक बीत रहे है ऐसे में जायदातर लोगो का यही सोचना है कि रैबार ‘आवा अपणु घौर’ या रह-बाहर!


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